न्यू मीडिया के दौर में ‘फेक न्यूज़’ एक चुनौती

सुशांत मिश्रा,असिस्टेंट एडिटर पंचायत टाइम्स
आज न्यू मीडिया के दौर में सूचना का आदान-प्रदान काफी आसान हो गया है, जिससे मीडिया जगत में कई अलग-अलग खबरों को प्रसारित करने के कई तरह के प्लेटफार्म उभर कर सामने आयें है. वहीँ मीडिया न्यू मीडिया के दौर में सोशल मीडिया भी आज कल एक मीडिया की भूमिका निभा रहा है या कहें तो यह भी मीडिया संस्थानों का एक अभिन्न अंग बन गया है जिसके माध्यम से आप सोशल मीडिया पर जुड़े यूजर तक अपनी ख़बरें पहुंचा रहे हैं. हम तकनीक का इस्तेमाल कुछ अच्छे परिणाम के लिए करते हैं लेकिन साथ-साथ इसके कुछ दुष्परिणाम भी होते हैं. आज ख़बरें जितने तीव्र गति से हर किसी के मोबाइल में पहुँच जाती है उतनी ही तीव्र गति से आज लोगों के मोबाइल में कई फेक न्यूज़ भी फैलाए जा रहे हैं. फेक न्यूज आज की न्यू मीडिया के लिए अभिशाप है.


फेक न्यूज़ एक तरीके से पीत पत्रकारिता का ही नया स्वरुप है, जिसमें किसी के पक्ष में दुष्प्रचार करना व झूठी ख़बरें फैलाना जैसे काम शामिल है. इस तरह की ख़बरों से किसी व्यक्ति या संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाने या लोगों को उसके खिलाफ झूठी खबर के जरिए भड़काने की कोशिश ही फेक न्यूज़ है. आज डिजिटल मीडिया में फेक न्यूज़ की भरमार है जिसके कारण लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता खतरे में दिखाई दे रही है.

*एक समारोह में महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी ने फेक न्यूज़ के सन्दर्भ कहा था कि आज पत्रकारिता "कठिन दौर" से गुजर रही है. फर्जी खबरें नये खतरे के रूप में सामने आई हैं. आज सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को उजागर करने वाली खबरों की अनदेखी की जाती है और उनका स्थान तुच्छ बातों ने ले लिया है. वहीँ "ब्रेकिंग न्यूज सिंड्रोम" के शोरशराबे में संयम और जिम्मेदारी के मूलभूत सिद्धांत की अनदेखी की जा रही है.*

आज इस विषय पर हमें सोचने की जरुरत है. आज हमारे देश में फेक न्यूज़ फैलने के कारण ही कुछ कुछ लोगों को अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ा है. फेक न्यूज़ के कारण लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव भी काफी प्रभावित होता है. 2016 के अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव में भी फेक न्यूज़ का सहारा लेकर मतों को प्रभावित करने की कोशिश की गई, वहीँ हमारे देश में भी सोशल मीडिया पर कई ऐसे कंटेंट वायरल किए जाते हैं जिसका सच से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है जिसका सीधा प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है. वहीँ कई बार इसका शिकार मीडिया हाउस वाले भी हो जाते हैं, जैसे की जब पूरे देश में नोटबंदी हुई थी तब कई मीडिया हाउस वालों ने दो हजार के नोट पर चिप लगने की बात को प्राथमिकता देकर कई कई कार्यक्रम किये थे परन्तु वह बात झूठ निकली.

आज हमारे आस पास हर दिन कई तरह के कंटेंट इन्टरनेट पर अनेकों माध्यम से उपलब्ध कराये जा रहे हैं लेकिन इसकी सत्यता क्या है किसी को नहीं पता. इसकी गहराई में जाने से पहले यह कई लोगों तक पहुँच चूका होता है. सरकार को इस तरह की सूचनाएं फ़ैलाने को लेकर कड़े कानून बनाने चाहिए ताकि जनता तक सही खबर पहुँच सके.वहीँ आज भी हमारे देश का साइबर कानून काफी कमजोर है जिससे कोई भी आसानी से बच सकता है इस पर सरकार को सोचने की जरुरत है. इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमें ऐसी गाइड लाइन की जरूरत है, जिससे ऑनलाइन अपराध करने वालों और सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी पोस्ट करने वालों को ट्रैक किया जा सके। सरकार ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि उसके पास सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने की कोई तकनीक नहीं है.

आज देश में कई एजेंसियों ने फेक न्यूज़ का सच लोगों तक लाने के लिए काम कर रही है लेकिन यह काफी नहीं है क्योंकि इनकी पहुँच अभी व्यापक नहीं है जिसके कारण फेक न्यूज़ पर लगाम लग सके या लोगों तक तुरंत सच पहुंचे. वहीँ बढ़ते फेक न्यूज़ के कारण सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स भी इस पर काम कर रहे हैं क्योंकि कई बार इनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे हैं जिस कारण व्हाट्सएप्प और फेसबुक ने फेक न्यूज़ को रोकने के लिए अपने फीचर में कई बदलाव भी किए हैं लेकिन इस पर अभी और काम करने की जरुरत है ताकि एक स्वच्छ वातावरण का निर्माण हो सके.